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पित्त:

इस दोष से अग्नि और जल दोनों के ही गुण निहित हैं. यह तीक्ष्ण, गर्म, क्षारमई, चिकनाई युक्त लसलसा, पीले रंग का पदार्थ है जिस से शरीर में हो रहे प्रत्येक रूपांतरण के कार्य में सहायता मिलती है. पाचन की क्रिया को सुचारू रूप से करना, चयपचय (metabolism), इंद्रियों की संवेदनशीलता तथा ग्राहक (कुछ भी ग्रहण करना या लेना) शक्ति, ये सब पित्त द्वारा ही किया जाता है. पित्त में उत्पन्न दोष से इन अब कार्यों में तीक्ष्णता अथवा अवरोध उत्पन्न हो सकता है. इससे जलन या सूजन का आभास भी हो सकता है. पित्त दोष की विकृति के कुछ लक्षण: चिड़चिड़ापन, खाली पेट होने पर वमन होना, जोड़ों में सूजन, शरीर में अत्यंत गर्मी का अनुभव.

कफ:

पृथ्वी और जल से निर्मित यह दोष भारी, ठंडा, तैलीय, घना, स्निग्ध, मधुर, भोथरा, ठोस, स्थाई पदार्थ है. यह शरीर को स्थिरता और आकार प्रदान करता है. कफ शरीर के सप्त धातुयों (रक्त, रस, माँस, मेध, मज्जा, अस्थि, शुक्र) को पुष्टि प्रदान कर इनके निर्माण में सहायता करता है. कफ के बढ़ने से शरीर में माँस, और वसा(fat) बढ़ जाती है जिससे शरीर में भारीपन और आकार में बढ़ोत्तरी हो जाती है.

Ayurvedic

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